पिछले ही हफ्ते मैंने एक कमाल की हाथ क़ि सफाई देखी - या यह कहना ज्यादा ठीक होगा क़ि, कमाल की हाथ क़ि सफाई का अनुभव किया या और बेहतर,.कमाल की हाथ क़ि सफाई का भुक्तभोगी हुआ. मैं उस कलाकार क़ि तारीफ़ किये बगैर नहीं रह सक रहा हूँ - बेशक, उसने मेरे ही मोबाइल फोन पर क्यों न अपना हाथ साफ़ किया हो. या तो वो अपने फन में माहिर था या फिर मै ही बूढ़ा रहा हूँ. पर चूंकि अपने को अभी से बूढ़ा मानना नहीं सुहाता, तो यही कहना बेहतर होगा क़ि वो ही कमाल का था! पर वाकई....
लखनऊ के पोलिटेक्निक चौराहे (जो हाल के वर्षों में एक गोल चक्कर में परिवर्तित हो चुका है) से गोमती नगर, विवेक खंड तक का ही सफ़र था. और उस विक्रम में ५-७ मिनट ही लगे होंगे. बस.
हमारी रास्ते की पूछताछ से वो समझ गया होगा क़ि हम यहाँ नए हैं. वैसे, उसने जिस तरह अपने हाथों पर स्वेटर ओढ़ रखा था, वह मुझे अजीब ज़रूर लगा था.
और तभी मुझे कुछ हरकत होती लगी. मेरे वास्कट आगे से खुली थी और उसके अन्दर क़ि जेब में मुझे अपने बटुए का ख्याल आया. फिर सोचा क़ि विक्रम में तो लोग यूँ ही चिपक कर बैठने को मजबूर होते हैं, और धक्के भी लगते हैं. पर अगले ही क्षण मैं फिर असहज महसूस करने लगा. तो मैने जेब से अपना बटुआ निकाल कर अपने हाथ में रख लिया और कुछ निश्चिन्त हो गया.
कुछ ही देर मे अपना ठिकाना भी आ गया. पर जब तक जाना क़ि बटुआ तो बच गया, पर मोबाइल उढ़ गया, तब तक विक्रम जा चूका था. मैं अपना हाथ मलता रह गया.
विक्रम का नंबर याद हो या चालक का चेहरा - कौन सफ़र में यह ख्याल करता है.
मैं दंग सा रह गया क़ि मेरे चौकन्ना होने के बावजूद वो अपना कमाल दिखा गया. ज़ब मुझे पहली बार हरकत होती लगी, घटना उसी समय घटी होगी.
तब से अब, हफ्ता हो गया है. नंबर मैं ब्लाक करा चूका हूँ, और वही नंबर मुझे दुबारा मिल भी चूका है. मगर मैने अभी दूसरा फोन खरीदा नहीं है.
फोन के बिना, एक शान्ति भी महसूस हो रही है.
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